रिलायंस के बॉन्ड पर टूटे निवेशक लेकिन LIC ने नहीं दिखाई ज्यादा दिलचस्पी, जानिए क्यों?

Updated on 16-09-2026 01:56 PM
नई दिल्ली: दिग्गज उद्योगपति मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज मार्केट वैल्यू के हिसाब से देश की सबसे बड़ी कंपनी है। रिलायंस पांच साल के बॉन्ड इश्यू के जरिए ₹12,500 करोड़ जुटा रही है। इस ट्रांजैक्शन को मैनेज करने वाले लेंडर्स में एक्सिस बैंक, HDFC बैंक, ICICI बैंक और यस बैंक शामिल हैं। यह इश्यू 18 सितंबर को बंद होने वाला है। इस पर सालाना कूपन यानी वार्षिक ब्याज 7.47% होगा।
ईटी की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि रिलायंस के बॉन्ड का सबसे बड़ा हिस्सा एक्सिस बैंक को मिलने की उम्मीद है। इसके बाद ICICI बैंक, HDFC बैंक और यस बैंक का नंबर आता है। यह इश्यू 18 सितंबर को बंद होने वाला है। यह ट्रांजैक्शन ऐसे समय में हो रहा है जब विदेशी मुद्रा जमा में बढ़ोतरी के कारण बैंकों के पास लिक्विडिटी बढ़ी है। इससे उन्हें कॉर्पोरेट लेंडिंग के लिए ज्यादा फंड मिल रहा है।

LIC की बेरुखी

इस बारे में अलग-अलग बैंकों और रिलायंस के प्रवक्ता ने टिप्पणी के अनुरोधों का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। इस इश्यू में ₹10,000 करोड़ का बेस साइज और ₹2,500 करोड़ का ग्रीनशू ऑप्शन शामिल है। इश्यू का लगभग ₹3,000 करोड़ हिस्सा एंकर इन्वेस्टर्स को दिया गया, जबकि बाकी हिस्सा भी पूरी तरह से सब्सक्राइब हो गया है।
यह रिलायंस का नवंबर 2023 के बाद पहला रुपया बॉन्ड ऑफर है। 2023 में इसके पिछले रिटेल बॉन्ड इश्यू की मैच्योरिटी अवधि 10 साल थी और उसमें LIC ने बड़ी भागीदारी की थी। लेकिन इस बार एलआईसी कोई बड़ा इन्वेस्टर नहीं है। सूत्रों के मुताबिक इसकी एक वजह यह है कि इसकी मैच्योरिटी अवधि पांच साल है। साथ ही बैंकों के पास इस समय काफी लिक्विडिटी है।

कहां से आया पैसा?

भारतीय बैंकों ने RBI की स्पेशल स्वैप सुविधा के तहत FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए रेकॉर्ड रकम जुटाई है। बैंकों ने 31 अगस्त तक इस स्कीम के जरिए $127.2 बिलियन जुटाए, जिससे स्पेशल स्कीम के तहत कुल इनफ्लो $136.4 बिलियन हो गया। अकेले ICICI बैंक ने FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए $17.88 बिलियन जुटाए।
बैंकों इस लिक्विडिटी का यूज कॉर्पोरेट लोन, प्रोजेक्ट फाइनेंस, कॉर्पोरेट बॉन्ड, वर्किंग कैपिटल या अन्य एसेट्स के लिए कर सकते हैं। हालांकि, कुछ जानकारों का कहना है कि अतिरिक्त FCNR लिक्विडिटी से आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ तेजी से बढ़ सकती है। साथ ही बैंकों के बीच होड़ की वजह से लेंडिंग स्प्रेड पर दबाव पड़ सकता है।

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