भूटान ने किया वह कमाल, जिस पर चीन से लेकर भारत तक पूरी तरह फेल, दुनिया क्यों मानती है 'आदर्श देश'

Updated on 16-09-2026 01:33 PM
थिंपू: नेपाल ने बीते महीने भयावह बाढ़ का सामना किया, जिससे देश के बड़े हिस्से में तबाही हुई है। बाढ़ के बाद नेपाल सरकार ने भारत, चीन जैसे बड़े कार्बन उत्सर्जक पड़ोसी देशों पर गुस्सा निकालते हुए मुआवजे (क्लाइमेट कंपनसेशन) की मांग कर डाली। दुनिया के बड़े देश लगातार इस बात को लेकर पर्यावरणविदों के निशाने पर हैं कि वह बहुत ज्यादा कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं। भारत और चीन इसमें दो अहम नाम हैं लेकिन इन दोनों देशों के पड़ोस में एक ऐसा देश भी है, जो कार्बन छोड़ने से ज्यादा सोखता है। ये देश भूटान है, जिसकी पर्यावरण को लेकर संवेदनशीलता से पूरी दुनिया सीख सकती है। पर्यावरण के मामले में दुनिया भूटान को आदर्श की तरह देखती है।

दुनियाभर के देश वैश्विक मंचों से नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन तक पहुंचने का वादा बीते कुछ वर्षों में करते देखे गए हैं। हालांकि वादों से इतर जमीन पर कोई भी देश इस लक्ष्य की तरफ जाता हुआ नहीं दिख रहा है। वहीं भारत और चीन के बीच बसा हिमालय का एक छोटा सा देश भूटान इस मामले में अलग है। दस लाख से भी कम आबादी वाला यह मुल्क कार्बन न्यूट्रैलिटी (कार्बन उत्सर्जन और उसे सोखने की मात्रा बराबर होना) का लक्ष्य नहीं बना रहा है। बल्कि उससे बेहतर स्थिति उसने पहले से हासिल की हुई है।

भूटान के जंगल

भूटान के के जंगल हर साल उतनी CO2 सोखते हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था से निकलने वाली CO2 की मात्रा से तीन से चार गुना ज्यादा है। इस वजह से यह दुनिया के उन दो-तीन देशों में से एक है (पनामा और सूरीनाम बाकी देश हैं) जो 'कार्बन नेगेटिव' की कड़ी परिभाषा पर खरे उतरते हैं। भूटान के ना सिर्फ लोग अपने जंगल के लिए संवेदनशील हैं बल्कि देश का संविधान भी वनों की रक्षा करता है।

भूटान के 2008 के संविधान में एक ऐसी धारा है, जो दुनिया के किसी भी दूसरे देश के संविधान में नहीं मिलती। संविधान में लिखा है कि सरकार देश की जमीन के 60 प्रतिशत हिस्से में जंगल कायम रखेगी। खास बात ये है इसे सरकार वोटिंग के जरिए बदल नहीं सकती है। यह पक्की संवैधानिक गारंटी है, जिसे भूटान की कोई भी सरकार मूल दस्तावेज में संशोधन किए बिना हटा नहीं सकती है।
सरकार यह पक्का करेगी कि देश के प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और इकोसिस्टम को खराब होने से रोकने के लिए देश की कुल जमीन का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा हमेशा जंगल के रूप में बना रहे।
भूटान का संविधान

कार्बन उत्सर्जन के आंकड़े

हार्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यू में शेल्बी जुंग के 2022 के विश्लेषण के अनुसार, भूटान के जंगल हर साल 9 मिलियन टन CO2 सोखते हैं, जबकि देश की पूरी अर्थव्यवस्था 2 मिलियन टन CO2 पैदा करती है। जितनी कार्बन डाइऑक्साइड सोखी जाती है और जितनी छोड़ी जाती है, उसके बीच के अंतर से हर साल तकरीबन 70 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड कम हो जाती है।
भूटान का वन क्षेत्र 72 प्रतिशत है, जो संविधान में तय कम से कम 60 प्रतिशत की सीमा से ज्यादा है। संविधान का वन नियम इसका आधार है और इसे कई संबंधित नीतियों का समर्थन है। लकड़ी निर्यात के लिए पेड़ों की कटाई पर पूरी रोक है। ग्रामीण किसानों को लकड़ी के ईंधन का इस्तेमाल छोड़ने के लिए मुफ्त पनबिजली दी जाती है। पर्यटन को भी सीमित रखा गया है।

भूटान ने ये काम कैसे किया

भूटान ने इस कमाल को करने के पीछे कई वजह हैं। जैसे- भूटान ने कम उत्सर्जन वाले आधार से शुरुआत की (हाल तक उसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर आधारित थी)। देश की आबादी बहुत कम है, प्रति व्यक्ति जल-विद्युत संसाधन बहुत ज्यादा हैं। देश में राजशाही वाली परंपरा की वजह से पर्यावरण से जुड़े वादों को आसानी से संविधान में शामिल किया जा सका।
भूटान का भूगोल भी ऐसा है कि शुरुआत से ही वहां का ज़्यादातर हिस्सा जंगलों से घिरा हुआ है। जो देश पहले ही औद्योगिक हो चुके हैं, जहां तेजी से शहरीकरण हुआ है, और जो कोयले या गैस से बिजली बनाते हैं, वे चाहकर भी इस मॉडल को नहीं अपना सकते। हालांकि मुश्किल यह है कि भूटान भी उन देशों में से है, जो जलवायु परिवर्तन के नतीजों के बुरे असर का सामना कर रहे हैं।

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